जय माता दी
हिंगलाज पर्वत पर माँ भवानी देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर स्थित था, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान में चला गया। माँ भवानी के भक्तों ने उनकी प्रतिदशा स्वरूप कई स्थानों पर माँ की मूर्तियाँ स्थापित कर पूजा प्रारंभ की। अमरावती घाट में भी वर्षों पूर्व एक पीपल के पेड़ के नीचे माँ की प्राचीन मूर्ति स्थापित की गई थी, जिसे लोग अम्बा भवानी देवी के नाम से पूजते थे और उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती थीं।
जब कोई महामारी फैलती थी, तो गाँव के लोग सामूहिक रूप से माँ के श्री चरणों में आराधना करते थे, जिससे उन्हें लाभ मिलता था। आज भी चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को गाँव के प्रत्येक घर से लोग पूजा लेकर माँ के दरबार में पहुँचते हैं। मान्यताओं के अनुसार, नीम की पत्तियों की छाया में दरबार में पहुँचकर अपनी मन्नत पूर्ण होने पर धन्यवाद ज्ञापित करते हैं और नारियल अर्पित कर कोटिशः धन्यवाद देते हैं। कई लोग माँ को प्रसन्न करने के लिए अपने शरीर में धागे पिरोकर नृत्य करते हैं।
माता के पुजारी यमनराव अम्बाडकर ने बताया कि माता के आशीर्वाद से इस मंदिर की देखभाल की जिम्मेदारी तत्कालीन मालगुजार आनंदराव भाई व्यंकटराव खन्ना (खत्री) द्वारा की जाती थी, जिन्होंने बाद में एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर के नाम ५ एकड़ जमीन कर दी। इस जमीन से होने वाली आमदनी और श्रद्धालुओं द्वारा दी जाने वाली भेंट से आज मंदिर भव्य हो गया है। गाँव के बुजुर्ग रामप्रसाद खन्ना ने बताया कि माता के चरणों में श्रद्धा और आस्था से नमन करने पर सभी शुभकामनाएँ पूर्ण होती हैं। यहाँ के कई नागरिक माता के आशीर्वाद से बड़े पदों पर कार्यरत हैं और साधन संपन्न हैं। आज भी माता के दरबार में आनंदानुभूति होती है। भक्तों को कई चमत्कार दिखाने वाली माता अम्बा भवानी आप सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करें। जय माता दी।
अम्बा देवी मंदिर का इतिहास हिंगलाज पर्वत पर स्थित माँ भवानी के मंदिर से जुड़ा है, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान में चला गया। विभाजन के बाद, माँ भवानी के भक्तों ने उनकी मूर्तियों को भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थापित किया और उनकी पूजा प्रारंभ की। अमरावती घाट में एक पीपल के पेड़ के नीचे माँ अम्बा भवानी की एक प्राचीन मूर्ति स्थापित की गई थी। इस मूर्ति की स्थापना के साथ ही यहाँ भक्तों ने माँ की पूजा करना प्रारंभ किया।
मंदिर की देखभाल और प्रबंधन की जिम्मेदारी प्रारंभ में तत्कालीन मालगुजार आनंदराव भाई व्यंकटराव खन्ना (खत्री) द्वारा की जाती थी। उन्होंने एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर के नाम ५ एकड़ जमीन दान में दी। इस जमीन से होने वाली आमदनी और भक्तों द्वारा दी जाने वाली भेंट से मंदिर का विकास हुआ और आज यह एक भव्य मंदिर के रूप में स्थापित है।
माँ अम्बा भवानी की महिमा और चमत्कारों के कारण, भक्त यहाँ अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आते हैं। विशेष रूप से, जब भी कोई महामारी फैलती थी, गाँव के लोग सामूहिक रूप से माँ के श्री चरणों में आराधना करते थे, जिससे उन्हें लाभ मिलता था। माँ अम्बा भवानी की कृपा से गाँव के कई नागरिक बड़े पदों पर कार्यरत हैं और साधन संपन्न हैं।
मंदिर में वर्ष भर कई धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं, जिनमें प्रमुख है चैत्र यात्रा। चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हर घर से लोग पूजा लेकर माँ के दरबार में पहुँचते हैं। नीम की पत्तियों की छाया में अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण होने पर नारियल अर्पित कर माँ का धन्यवाद करते हैं।
मंदिर की सेवा और विकास में श्रद्धालुओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। भक्त अपने समय, धन, और संसाधनों से मंदिर की सेवा करते हैं। इसके अतिरिक्त, विभिन्न स्वयंसेवी समूह, जैसे अम्बा देवी संस्थान, चुनरी यात्रा समूह, सजावट समूह, महाप्रसादी समूह, और मेला समिति समूह मंदिर के विभिन्न कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
मंदिर की सेवा और सुविधाएँ
अम्बा देवी मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि आस्था, श्रद्धा, और सामुदायिक एकता का प्रतीक भी है। यहाँ आने वाले प्रत्येक भक्त को माँ अम्बा भवानी की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का संचार होता है। जय माता दी।